Sunday, August 29, 2010

दो मित्रो का मिलन

आज मै एक कैफे गया, कैफे मालिक से नमस्ते होने के बाद आर्डर दिए ही थे की एक व्यक्ति अपने पुत्र के साथ कैफे में दाया पाँव बढ़ाते हुए प्रवेश किये और एयर कुलर के सामने वाली सीट पर विराजमान हो गए. संजोग से मेरी और उनकी नज़रे एक दूसरे से मिल गयी, मुझे उनके मेरे परिचित होने का आभास हुआ, मैंने अपने इतिहास के सभी परिचितो को याद करना शुरू किया और एक नाम उनपर जचने वाला याद आया. खैर, मैंने अपने पेट को भोजन से भर लिया, बिल भरा और बहार आ गया. बाहर आते ही मेरे बेटे ने मुझसे दिन में तारे खोजने का कारण पूछा, मैंने उसे उन अंकल के परिचित होने का शक जताया. मेरे बेटे ने मुझसे मेरे याद आये हुए शक्की नाम पर कॉल करने को कहा, मैंने उससे कारण पूछा, उसने बोला-"आपके फ़ोन मिलाने पर यदि वह अंकल मोबाइल उठाते है, मतलब यह अंकल वाही है जिनके बारे में आपने सोचा था". मुझे उसकी तरकीब पसंद आई और मैंने वैसा ही किया जैसा उसने मुझे कहा, इत्तेफांक से उन्होंने मोबाइल उठाया और हम दोनों की दुआ सलाम शुरू हो गयी, हमारे बीच केवल एक काले शीशे का फांसला था. कैफे मालिक हमारी हरकतों पर नज़र रखे हुए थे और वे सब समझ रहे थे, उन्होंने उन सज्जन व्यक्ति को मेरे बाहर खड़े होने का इशारा दिया और वे कैफे के बाहर आ गए. वे बाहर आये और मुझसे पूछा "क्या मैं आप ही से बात कर रहा हूँ" यह सुनते ही हम दोनों ने अपना मोबाइल फ़ेंक दिया और एक दूसरे से चिपट गए, हम दस वर्ष बाद मिल रहे थे और बहुत खुश थे. कैफे मालिक ने अपने चहरे पर एक मुस्कान दिखाई और अपने बाकी काम करने चले गए.
     
आज का उवाच-
खुशनसीब वह नहीं जिसका नसीब अच्चा हो, खुशनसीब वह होता है जो अपने नसीब पर खुश हो. 

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